प्रयागराज एक ऐसा तीर्थ स्थल जिसे तीर्थों का राजा माना जाता है l वास्तव में अगर तीर्थराज की ख़ूबसूरती देखनी है,तो लोगों को यहाँ आकर देखनी होगी वो भी महज़ उसवक्त जब यहाँ पर कुम्भ मेला चल रहा हो l वास्तव में इस 40 दिनों में धरती पे मानो स्वर्ग बसा हो, स्वर्ग के सभी तारें मानो धरती पर आ गए हो l
मकर संक्रांति से शुरू होकर महाशिवरात्रि तक करते हैं लोग कल्पवास:- प्रत्येक वर्ष लगभग 6:30 सौ हेक्टेयर में बसे इस माघ मेले में दूर दूर से आएं साधु संत और कल्पवासी संगम तट वाले क्षेत्र में अपना सराय बनाकर अपने मोक्ष की प्राप्ति के लिए पूरे 40 दिन कड़कडाती ठंड में कल्पवास पूरा करते हुए पूर्णिमा, बसंत पंचमी और मोनी अमावस्या इन सभी स्नान पर्व पर लोग भोर से ही कड़ाके की ठंड में पूरे दिन मां गंगा में भारी संख्या में स्नान करते हैं l
यहा के स्थायी लोगों का मानना है कि तीर्थ राज में मनुष्यों के साथ साथ पशु पंक्षि भी अपने मोक्ष की प्राप्ति के लिए यहाँ आते है l ये सुनके थोड़ा अटपटा ज़रूर लग रहा है लेकिन ये परम सत्य है सायिबेरिया से कुछ पक्षी दिसम्बर माह में कुम्भ शुरू होने से पहले इस पावन धरती पे आ जाते है l सायिबेरियन पंक्षि मेले तक खुले वातावरण में क्रीड़ा करके मार्च माह तक अपने बसेरे पे चले जाते है l ठीक वैसे जैसे मनुष्य अपने कल्पवास पूरा होने के बाद अपने घर को चला जाता है l क़ुदरत की ये अनोखी खेल सिर्फ़ अगर देखा जाए तो वो प्रयाग में हीं देखने को मिलता है l
जगह जगह चलता है भंडारा:- 40 दिनों तक चलने वाले इस मेले के दौरान ओम नमः शिवाय, वाहेगुरु और भी अन्य संस्थाओं द्वारा पूरे माघ मेले के दौरान आए हुए लोगों के लिए भंडारे का आयोजन किया जाता है l जिसमें बड़े ही आस्था के साथ लोग भारी संख्या में आकर प्रसाद को ग्रहण करते हैं l
मेला देखने के लिए लोगों की लगती है ता ता:- माघ मेले के दौरान संगम क्षेत्र में स्थित परेड ग्राउंड में तरह-तरह की दुकानों के साथ-साथ बड़े बड़े झूले लगे होते हैं जिसे देखने के लिए शाम के समय स्थानीय लोगों की भारी-भरकम भीड़ देखने को मिलती है l शाम के समय अपने परिवार के संग आए हुए लोग मेले का भरपूर आनंद उठाते हैं।
मान्यता-यहाँ पर तीन नदियों का मिलन होता है l गंगा,जमुना और सरस्वती तीनो नादिया आपस में आकर जहा मिलती है l उस स्थान को संगम कहा गया सरस्वती अलुप्त है l संगम के इस पावन धरती पर संगम तट से थोड़ी दूरी पर जमुना तट के समीप और मुगलकालीन अकबर किला के ठीक बगल विश्व प्रसिद्ध लेटे हुए बड़े हनुमान जी का मंदिर हैं मान्यता है कि पतितपवनिय मां गंगा जब अपने उफान पर होती हैं तो वर्ष में एकबार पवन पुत्र को स्नान कराने उनके स्थान पर ज़रूर आती है । विश्व प्रसिद्ध प्राचीन बड़े हनुमान जी के दर्शन के लिए भारत के कोने कोने से लेकर विदेश तक के लोग आते हैं l प्रत्येक मंगलवार और शनिवार दूर-दूर से आए लोगों की भारी संख्या में भीड़ देखने को मिलती है l
संगम स्नान और बड़े हनुमान जी के दर्शन करने के बाद आए हुए दर्शनार्थी मंदिर के ठीक बगल किला के अंदर हजारों वर्ष पुरानी अक्षय वट वृक्ष का भी दर्शन करते है l
प्रयाग नाम की उत्पत्ति-हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार सृष्टि के रचईता ब्रम्हां जी जब सृष्टि रचना का कार्य पूर्ण कर लिए तब उन्होंने अपना पहला यज्ञ इसी स्थान पर किए थे l जिसे ‘प्रथम यज्ञ’ का नाम दिया गया। प्रयाग का ‘प्र’ प्रथम शब्द से लिया गया है और ‘याग’ यज्ञ शब्द से लिया गया है। इस प्रकार ‘प्रयाग’ शब्द की उत्पत्ति ब्रम्हां जी द्वारा किये गए सृष्टि के ‘प्रथम यज्ञ’ से हुयी।
इस पावन धरती पर महर्षि भारद्वाज की कुटिया भी है l यह कुटिया गंगा तट से थोड़ी दूरी पर स्थित है l मान्यता है कि महर्षि भारद्वाज ने ही प्रयाग शहर को बसाया था और प्रयाग वासियों के शिक्षा दीक्षा के लिए उन्होंने यहां पर गुरुकुल का भी निर्माण कराया था l
संस्कृति और पर्यटन स्थल- प्रयागराज की संस्कृति और पर्यटन स्थल राष्ट्र की धरोहर के रूप में है । क्योंकि यहाँ पर शहीद चंद्रशेखर आजाद पार्क, आनंद भवन, और खुसरो बाग़ जैसे पुराने यादों भरी पुरातात्विक स्थल है l संस्कृति के तौर पर कुछ दूरी पर जैंनधर्म, बौद्धधर्म के मंदिर भी यहां बने हुए है l
Anand tripathi






बेहतरीन भाई
ReplyDeleteधन्यवाद भाई
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