नृत्यकला का लगाव प्राचीनकाल से हीं भारतीय संस्कृति एवं धर्म से जुड़ा रहा हैं l नृत्यकला एक ऐसी कला है जिसके शौंदर्य दर्शन और रस पान मात्र से ही पत्थर के समान कठोर व दृढ़ प्रतिज्ञ मानव हृदय को भी मोम सदृश पिघलाने की शक्ति रखता है l अगर सही मायने में देखा जाए तो नृत्यकला का उदय मानव जीवन के साथ हीं हुआ है l नृत्य मानवीय अभिव्यक्तियों का एक रसमय प्रदर्शन है l नृत्य कला गायन कला यह सब मुख्यतः सामवेद के अंतर्गत आते हैं। नृत्य का प्राचीनतम ग्रंथ भरतमुनि का नाट्यशास्त्र के रूप में माना जाता है। नृत्य कला का उल्लेख पौराणिक गाथाओं में भी मिलता है क्योंकि यह कला देवी देवताओं के साथ-साथ दैत्य दानव को भी अति प्रिय था। पौराणिक कथाओं के अनुसार अगर देखा जाए तो इंद्रलोक के साथ-साथ सागर मंथन के पश्चात अमृत पान के समय नृत्य तथा भस्मासुर को खत्म करने के लिए विष्णु जी के द्वारा किए गए नित्य को दिखाया गया है।
देव, दानव, दैत्य, और मनुष्य के साथ साथ पशु पंक्षियो के अंदर भी नृत्यकला के गुण देखने को मिलते है l बसंत ऋतु में मोर और मोरनी दोनो घने जंगल में इस नृत्यकला का आनंद उठाते है, जो देखने में मनमोहनिय होता है l तो वही हिरन और हिरनी इधर उधर उछल कूद कर के क्रीडा करते हुए अपने नृत्य कला को दर्शाते हैं l
इतिहास:- इतिहास की दृष्टि से देखे तो नृत्यकला के प्रमाण सबसे पहले साक्ष्य गुफाओं में प्राप्त आदिमानव के उकेरे चित्रों तथा हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाईयों में प्राप्त मूर्तियाँ मानी जाती हैं, जिनके संबंध में पुरातत्वेत्ता के जानकार नर्तकी होने का दावा करते हैं।
नृत्यकला हमारी निजी जीवन एवम् अंतरात्मा के भावनाओं को छूने के साथ-साथ हमें परम आनंद की अनुभूति दिलाने का भी कार्य करता है l
भारतवर्ष में अलग अलग राज्यों में अलग अलग तरह के नृत्यकला उनके संस्कृति के आधार पर किए जाते है l जिसके ज़रिए वो अपने राज्य के सभ्यता एवम् संस्कृति को अपने नृत्य कला के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करते है l
Anand Tripathi
Student journalism and Mass communication
University of Allahabad



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